वाजपेयी सरकार की 8 घटनाएं जो हमेशा रहेंगी याद

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब नहीं रहे। उनके निधन से भारतीय राजनीति की उस यशस्वी आवाज का अध्याय समाप्त हो गया है जिसने पहली बार देश में किसी गैर कांग्रेसी पीएम के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया। पीएम पद पर रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, ऐसे फैसले लिए गए जो हमेशा याद रखे जाएंगे।

8 घटनाओं के बारे में जिनका जिक्र तब-तब जरूर होगा जब अटल याद किए जाएंगे…

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने 1998 में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर न केवल दुनिया को चकित कर दिया बल्कि अमेरिकी प्रतिबंधों को भी धता बताया। इसके बाद विदेश मंत्री जसवंत सिंह और अमेरिकी डेप्युटी स्टेट सेक्रटरी के बीच चल रही वार्ताओं ने भारत-अमेरिका संबंधों का नया अध्याय खोला। अटल सरकार ने अमेरिका को सहज सहयोगी बताते हुए हाइटेक समझौतों की शुरुआत की जिसने 2005 में भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते का रूप लिया।

तत्कालीन पीएम वाजपेयी ने पहली बार बस में यात्रा की। लाहौर के मिनार-ए-पाकिस्तान में वाजपेयी ने विजिटर्स बुक में लिखा कि भारत चाहता है कि पकिस्तान संप्रभु और खुशहाल राज्य बने। यह पहली बार था कि किसी भारतीय नेता पाकिस्तान की संप्रुभता पर जोर दिया था। यह इसलिए भी खास था क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा ‘अखंड भारत’ की बात करता है।

करगिल युद्ध के दौरान भारत की विजय हुई। अटल सरकार ने करगिल शहीदों के लिए मुआवजे की घोषणा की। साथ ही शहीद सैनिकों के अंतिम संस्कार को सार्वजनिक तौर पर करने का फैसला लिया। इन चीजों का अंतरराष्ट्रीय दबाव बना। तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ को समन किया और उन्हें सेना हटाने का आदेश दिया। बाद में इस्लामाबाद की अपनी 6 घंटे की यात्रा के दौरान क्लिंटन का एक कथन काफी मशहूर हुआ। तब क्लिंटन ने कहा था कि सीमा रेखा को खून से दोबारा नहीं खींचा जा सकता।

काठमांडु से हाइजैक कर कंधार ले जाए गए विमान से यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के लिए वाजपेयी सरकार ने आतंकी मौलाना मसूद अजहर और ओमर सईद शेख को रिहा किया। आतंकी मसूद अजहर ने बाद में चलकर पाकिस्तान में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद बनाया और ओमर शेख ने 9/11 का हिस्सा रहने के साथ-साथ अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या भी की।

नाभिकीय हथियारों में कटौती करने, कश्मीर विवाद और सीमा पार आतंकवाद पर बातचीत करने के लिए वाजपेयी और मुशर्रफ दो दिनों के लिए आगरा में मिले। हालांकि यह बातचीत सफल नहीं हुई। मुशर्रफ ने भारतीय संपादकों से बात करते हुए कहा कि कश्मीर अकेला मुद्दा है। भारत ने ड्राफ्ट अग्रीमेंट को खारिज कर दिया।

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के 5 आतंकियों ने संसद को थर्रा दिया। भारतीय संसद पर हुए हमले में आतंकियों सहित कुल 12 लोगों की मौत हुई थी। वाजपेयी सरकार ने इस हमले की कड़ी प्रतिक्रिया देने का फैसला लिया। 5 लाख से अधिक सैनिकों को सीमा पर खड़ा कर दिया गया। फाइटर विमान और नेवी के जहाज कड़ा संदेश देने के लिए तैयार कर दिए है। छह महीने तक सीमा पर तनाव की स्थिति रही और एक्सपर्ट्स का मानना है कि दोनों देश दो बार युद्ध के बिल्कुल नजदीक तक पहुंचे। बाद में अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद मुशर्रफ ने बयान जारी किया और सीमा पर से सैनिक हटाए गए।

गुजरात दंगों के दौरान राज्य मशीनरी पर ऐंटी मुस्लिम हिंसा में सहभागी होने के आरोप लगे थे। ऐसे में मोदी सरकार की निंदा करने में हिचकिचाहट को लेकर वाजपेयी की आलोचना हुई थी। तब अहमदाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीड़ितों के पुनर्वास की घोषणा करते हुए वाजपेयी ने कहा था कि मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए।

इस्लामाबाद में सार्क सम्मेलन के इतर वाजपेयी और मुशर्रफ की मुलाकात हुई। पहली बार मुशर्रफ ने आधिकारिक रूप से माना कि आतंकियों को भारत के खिलाफ पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे। इस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच कंपोजिट डायलॉग की शुरुआत हुई।

निरंजन कुमार

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