कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने हैं ये आठ बड़ी चुनौतियां।

कांग्रेस के भीतर युवा और बुजुर्ग नेताओं के बीच मौजूद वैचारिक मतभेदों को दूर कर आपसी सामंजस्य बिठाना भी किसी चुनौती से कम नहीं।

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गांधी परिवार से बाहर का मुखिया चुनने की कवायद के बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने एक बार फिर सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के नेतृत्व पर ही भरोसा जताया है। पार्टी नए मुखिया के चुनाव तक वही पार्टी की कमान संभालेंगी।

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) 19 साल तक कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी हैं। सीताराम केसरी के बाद 14 मार्च 1998 को उन्होंने अध्यक्ष पद संभाला और 16 दिसंबर 2017 तक इस पद पर रहीं। 17 दिसंबर 2017 को राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने। राहुल ने 3 जुलाई, 2019 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था।

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) भले ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर कार्यभार संभालेंगी। लेकिन इसके बावजूद वर्तमान दौर में कांग्रेस को उबारना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। केंद्र सरकार के लगातार दो बार के कार्यकाल के कामकाज, फैसलों और उठाए गए मुद्दों के बीच उभरकर सामने आए भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तिलिस्म को तोड़ना इनमें सबसे बड़ी चुनौती होगी।

भारतीय जनता पार्टी की आक्रामक प्रचार शैली के साथ शुरू हुए सदस्यता अभियान के साथ ही कांग्रेस की लोकप्रियता में भी गिरावट देखने को मिली है। वहीं कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी फूट किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में जमीन खोती जा रही पार्टी को टूट और बिखराव से बचाना सोनिया के लिए चुनौती होगी।

इधर भाजपा अपने प्रचार अभियान के दौरान राजनीति में युवाओं और युवा चेहरों पर फोकस करती रही है। ऐसे में कांग्रेस के भीतर युवा और बुजुर्ग नेताओं के बीच मौजूद वैचारिक मतभेदों को दूर कर आपसी सामंजस्य बिठाना भी किसी चुनौती से कम नहीं।

आने वाले समय में होने वाले कई राज्यों के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन को सुधारने के लिए भी सोनिया गांधी को खासी मशक्कत करनी होगी। पार्टी का जनाधार बचाए रखने के लिए यह सबसे जरूरी है।

अनुच्छेद 370 जैसे अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर तत्काल पार्टी लाइन तय करना बेहद जरूरी होगा। ताकि ऐसे मुद्दों पर सीधे जनता और देश से जुड़ाव का संदेश दिया जा सके।

पार्टी के देशभर में मौजूद तमाम कार्यकर्ताओं में लगातार दो आम चुनावों 2014, 2019 की हार से निराशा का भाव है। ऐसे में सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं के दोबारा जोश और उत्साह भरना भी काफी चुनौती भरा होगा।

सोनिया गांधी को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी के बीच बेहतर राजनीतिक इस्तेमाल और भूमिका तय करनी होंगी। ताकि पार्टी अपनी खोती हुई जमीन को वापस पाने के लिए आगे बढ़ सके।

अंत में सबसे अहम बात होगी पार्टी के ऐसे नेताओं पर लगाम कसना जो विवादित बयानों को लेकर जाने जाते हैं। यह इसलिए भी जरूरी होगा क्योंकि मोदी सरकार के समक्ष किसी भी मुद्दे पर पार्टी लाइन से हटकर बयान देने का असर कांग्रेस की छवि पर पड़ सकता है।

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