हरियाणा में क्षेत्रीय दलों का वजूद खतरे में।

हरियाणा में इस बार लोकसभा चुनाव सूबे की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए सुखद साबित नहीं हुए। ऐसा पहली बार हुआ है जब क्षेत्रीय दल शुरुआत से ही चुनावी मुकाबलों से बाहर दिखे।

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हरियाणा में इस बार लोकसभा चुनाव सूबे की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए सुखद साबित नहीं हुए। ऐसा पहली बार हुआ है जब क्षेत्रीय दल शुरुआत से ही चुनावी मुकाबलों से बाहर दिखे। पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल हों या पूर्व सीएम बंसीलाल वे अपने क्षेत्रीय दलों से ही लोकसभा चुनाव जीतते आए हैं।

पूर्व सीएम भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस पार्टी का भी जलवा कुछ समय तक कायम रहा, लेकिन बाद में इस पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। इतना ही नहीं वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में तो इनेलो ने दो सीटों हिसार और सिरसा पर अपनी जीत भी दर्ज की थी। लेकिन इस चुनाव में किसी भी क्षेत्रीय दल का न तो कोई प्रभावशाली असर देखने को मिला, बल्कि नतीजों ने इनका पूरी तरह से सूपड़ा साफ कर दिया।

पिछले चुनाव की दो सीटें जीतने वाले इनेलो का प्रदर्शन पूरी तरह से निराशाजनक रहा। अधिकतर सीटों पर इनेलो प्रत्याशी चौथे व पांचवें नंबर पर आए। दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह रहा इनेलो का विघटन। चुनाव से ठीक छह महीने पहले चौधरी देवीलाल का परिवार टूट गया और विरासत बिखर गई।

इनेलो की कमान देवीलाल के छोटे पौत्र अभय चौटाला ने तो संभाल ली और बड़े पौत्र अजय चौटाला ने इनेलो से निकाले जाने केबाद अपना अलग दल जननायक जनता पार्टी बना ली। दोनों ही पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। जिस वजह से इनेलो का वोटबैंक अब दो पार्टियों में बंट गया। जिसका सीधा नुकसान दोनों पार्टियों को देखने को मिला। अब नतीजों के बाद आलम यह है कि दोनों ही दलों के लिए अपना वजूद बचाने की चुनौती है।

इनेलो और जजपा के अलावा इस लोकसभा चुनावों में अन्य दलों की हालत भी पतली ही दिखाई। भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी, हरियाणा लोकस्वराज पार्टी समेत आम आदमी पार्टी और बसपा की रणनीति पर नतीजों ने पूरी तरह पानी फेर दिया। इनके अधिकतर प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। अगले विधानसभा चुनावों में ये पार्टियां अब खुद को इस भंवर से कैसे उबारेंगी, ये इनके लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

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