केजरीवाल सरकार की बड़ी जीत, सुप्रीम कोर्ट ने कहा LG के पास स्वतंत्र अधिकार नहीं

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दिल्ली में केजरीवाल सरकार और एलजी के बीच चल रही अधिकारों की जंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एलजी को झटका दिया। पांच जजों के बेंच ने सर्वसम्मति से कहा कि असली ताकत मंत्रिपरिषद के पास है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंत्रिपरिषद के सभी फैसलों से उप-राज्यपाल को निश्चित रूप से अवगत कराया जाना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इसमें उप-राज्यपाल की सहमति आवश्यक है। कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि उपराज्यपाल को फैसले लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है और वह निर्वाचित सरकार की सलाह से काम करने के लिए बाध्य हैं।

कोर्ट ने इसके साथ ही दिल्ली सरकार और एलजी को आपसी तालमेल से काम करने की सलाह भी दी। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में पुलिस, लॉ ऐंड ऑर्डर और लैंड के मामले में सभी अधिकारी एलजी के पास ही रहेंगे। इससे इतर सभी मामलों में चुनी हुई सरकार कानून बना सकती है। गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने अगस्त 2016 में दिए अपने फैसले में कहा था कि दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश है और संविधान के अनुच्छेद 239 एए के तहत इसके लिए खास प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में राजधानी में एलजी प्रशासक की भूमिका में हैं।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति के निर्णय में कहा, ‘निरंकुशता और अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है।’ पीठ ने कहा कि उपराज्यपाल, जिसकी नियुक्ति केंद्र करता है, ‘विघ्नकारक’ के रूप में काम नहीं कर सकते। संविधान पीठ ने तीन अलग-अलग, लेकिन सहमति से दिए फैसले में कहा कि उपराज्यपाल के पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी, न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल थे।

इस व्यवस्था ने केजरीवाल को सही ठहरा दिया। पीठ ने उपराज्यपाल के लिए पहली बार स्पष्ट दिशानिर्देश दिए और दिल्ली, जो पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने के बावजूद अपने विधायकों को चुनती है और सरकार बनाती है , में कार्यपालिका की दो शाखाओं के अधिकारों को निरूपित किया है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोच्च हैं। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होनी चाहिए। सरकार जनता के लिए उपलब्ध हो और शक्ति का समन्वय जरूरी है। केंद्र और राज्य को समन्वय के साथ काम करना होगा। संघीय ढांचे में राज्यों को स्वतंत्रता दी गई है। जनमत का महत्व है, इसे तकनीकी पहलुओं में नहीं उलझाया जा सकता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि एलजी दिल्ली के प्रशासक हैं।

गौरतलब है कि केजरीवाल लंबे समय से बैजल पर आरोप लगा रहे थे कि वह केंद्र के इशारे पर उन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के अलावा दिल्ली सरकार को अन्य विषयों पर कानून बनाने और शासन करने का अधिकार है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शीर्ष अदालत की व्यवस्था के बाद सेवाएं दिल्ली सरकार के अधीन आ जाएंगी और राजनीतिक नेतृत्व का नौकरशाहों के तबादले और तैनाती में दखल होगा। उपराज्यपाल बैजल ने शीर्ष अदालत की इस व्यवस्था पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की।

पीठ के तीन जजों ने सीजेआई के फैसले पर हस्ताक्षर किए। जस्टिस ए.के. सीकरी, जस्टिस ए.एम. खानविलकर ने इस फैसले पर सहमति जताई है। हालांकि दो जजों ने इसके बाद अपना अलग फैसला पढ़ा। हालांकि असली ताकत मंत्रिपरिषद के पास ही है, इस पर पांचों जजों ने सर्वसम्मति से सहमति जताई।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने कहा, ‘यह दिल्ली की जनता की जीत है। लोकतंत्र के लिए बड़ी जीत है।’ बता दें कि हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-239 और 239 एए को साथ-साथ देखने और बिजनस ट्रांजैक्शन ऑफ एनसीटी दिल्ली 1993 के तहत दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश है, लेकिन 69वें संविधान संशोधन में इसमें विशेष प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि अनुच्छेद-239 एए आने के बाद भी अनुच्छेद 239 हल्का नहीं होता है। इस कारण एलजी कैबिनेट की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।

दिल्ली सरकार व केंद्र के बीच अधिकारों के लेकर पिछले कई सालों से जबरदस्त रस्साकशी चल रही थी। आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रही थी।

केंद्र सरकार ने दी थीं ये दलीलें

केंद्र सरकार की ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने दलील पेश करते हुए कहा कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है और उसे कभी भी राज्य के तौर पर नहीं रखा गया है।
संविधान में दिल्ली को राज्य के तौर पर रखने के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है और न ही ऐसी अवधारणा दिखती है। जो संविधान में विशिष्ट तौर पर उल्लेख नहीं है उसे केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के बारे में खुद से व्याख्या नहीं की जा सकती।
विधानसभा होने का यह मतलब यह नहीं है कि दिल्ली राज्य है और उसे दूसरे राज्यों की तरह अधिकार प्राप्त है। ऐसे में इस तरह की परिकल्पना नहीं की जा सकती कि केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के पास अलग से विशेष तौर पर एग्जीक्युटिव पावर है।
दिल्ली पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश है और आखिरी अधिकार केंद्र के जरिए राष्ट्रपति के पास है। दिल्ली को विशेष तौर पर एग्जीक्युटिव अधिकार के बारे में संविधान का कोई मकसद नहीं है और न ही ऐसी अवधारणा है क्योंकि इससे अव्यवस्था सी हो जाएगी।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि 1987 में केंद्र सरकार ने तमाम राजनीतिक पार्टियों की मांग कर एक कमिटी बनाई थी, जिसने इस तथ्य पर विचार किया था कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाए। लेकिन कमिटी ने इस मांग को ठुकरा दिया। दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है, इसके पास किसी राज्य के बराबर शक्तियां नही है।
दिल्ली सरकार खुद को पीड़ित बताकर सहानुभूति लेने की कोशिश में है।
दिल्ली के पास सह अस्तित्व की शक्तियां हैं इसे केंद्र शासित प्रदेश माना जाएगा। एलजी के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह मानना बाध्यकारी नहीं है।

दिल्ली सरकार की दलीलें
चुनी हुई सरकार के पास अधिकार होना जरूरी।
संविधान के अनुच्छेद-239 एए के तहत पब्लिक ट्रस्ट का प्रावधान है। यानी दिल्ली में चुनी हुई सरकार होगी और वह जनता के प्रति जवाबदेह होगी।
लैंड, पब्लिक ऑर्डर और पुलिस को छोड़कर राज्य और समवर्ती सूची में मौजूद मामले में दिल्ली विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है।
अगर संविधान में विधायिका का प्रावधान किया गया है तब उसे कानून बनाने का अधिकार होगा।
हम संसदीय वरीयता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन चुनी हुई सरकार बिना अधिकार के नहीं हो सकती।
अनुच्छेद-239 एए को इस तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता कि उसका मुख्य मकसद ही बेकार हो जाए।
अनुच्छेद-239 एए के तहत ही दिल्ली को विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया था।
अनुच्छेद-239 एए आखिर एक लोकतांत्रिक प्रयोग था। इसकी व्याख्या से ही तय होगा कि ये सफल रहा या नहीं।
239एए के तहत दिल्ली को विशेष दर्जा दिया गया है। इसकी व्याख्या करनी चाहिए।
239एए के तहत दिल्ली में चुनी हुई सरकार होगी जो जनता के लिए जवाबदेह होगी।
दिल्ली में मुख्यमंत्री, मंत्रियों का समूह और विधानसभा बनाया गया।
मंत्रियों के समूह द्वारा लिए गए फैसले से अगर एलजी सहमत नहीं हैं तो मामला राष्ट्रपति के पास चला जाता है। हर मामले में एलजी से सहमति ली जाती है और पूरा कंट्रोल उनके पास होता है।
अगर लोगों के प्रति फैसले में जवाबदेही नहीं होगी फिर क्या होगा।

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