कश्मीर मुद्दे पर मालदीव का बड़बोलापन, पहले भारत को नसीहद, फिर बयान पर लीपापोती

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मालदीव के एक मंत्री ने कश्मीर मुद्दे पर विवादित बयान दिया है और भारत को कश्मीर मुद्दे पर नसीहत तक दे डाली. हालांकि बाद में वहां के उच्चायुक्त ने मामले को संभालने की कोशिश की.

मालदीव सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद शाइनी ने मंगलवार को कहा था, ‘मालदीव ने कश्मीर मुद्दे पर न तो कभी दखल दिया न ही मध्यस्थता की पेशकश की क्योंकि वह भारत का आंतरिक मामला है. इसी तरह भारत को भी हमारे आंतरिक मामले में दखल नहीं देना चाहिए.’

शाइनी ने यह भी कहा था कि हमारा देश स्वतंत्र है और अपनी परिस्थितियों को दुरुस्त करने में सक्षम भी. अगर हमें मदद की जरूरत पड़ेगी, हम उन्हें बता देंगे. उनके इस बयान को भारत और मालदीव के बीच बढ़ती दूरियों के तौर पर देखा जा रहा है.

शाइनी के इस बयान पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई और इसे काफी ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया. भारत ने दोनों देशों की हालत को एक दूसरे से जुदा बताया. कश्मीर मसले को जहां पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का नतीजा बताया तो मालदीव को लोकतंत्र में खामियों का परिणाम.

मालदीव के एक मंत्री की ओर से कश्मीर पर विवादित बयान दिए जाने के बाद वहां के उच्चायुक्त अहमद मोहम्मद ने सफाई दी है. मोहम्मद ने कहा है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच दोपक्षीय मसला है जिसे उन्हें मिलजुलकर निपटाना चाहिए. उच्चायुक्त ने भारत और माले के बीच भी परस्पर संबंध बढ़ाने की वकालत की.

अहमद मोहम्मद ने माना कि हाल के कुछ वर्षों में भारत और मालदीव के बीच ‘अविश्वास की भावनाएं’ पनपीं जिससे दोनों देशों के रिश्ते पर असर पड़ा लेकिन दोनों देशों को कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए.

एक इंटरव्यू में उच्चायुक्त ने कहा, रिश्तों में गर्माहट के लिए मालदीव से बड़े-बड़े अधिकारी भारत आते रहे लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया. हो सकता है दोनों देशों के बीच पनपी कड़वाहट का एक कारण यह भी हो.

इमरजेंसी में भारत का हाथ?

मालदीव में कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई के आदेश के बाद सरकार और सुप्रीम कोर्ट में तनातनी देखी गई. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानने से इनकार कर दिया था. फिर राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने देश में इमरजेंसी लगा दिया था. इसके बाद खबरें चलीं कि भारत हिंद महासागर में बसे इस देश में सैन्य दखल दे सकता है. वह एक बार पहले भी ऐसा कर चुका है.

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