नेपाल और भारत के बीच मिट रहीं दूरियां, मगर चीन फिर कर सकता है रिश्ते खराब

चीन के बहकावे में आया पड़ोसी देश नेपाल अब एक बार फिर से भारत के साथ अपने संबंध बेहतर करना चाहता है।

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चीन के बहकावे में आया पड़ोसी देश नेपाल अब एक बार फिर से भारत के साथ अपने संबंध बेहतर करना चाहता है। नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार भारत के साथ अपने संबंधों को आगे ले जाने के लिए उत्सुक है और विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला की दो दिवसीय यात्रा के बाद नेपाल भारत के साथ ट्रेवल एयर बबल के मसले और बहुउद्देशीय पंचेश्वर परियोजना पर कुछ सकारात्मक कदम उठा सकता है। यह जानकारी इस मामले से परिचित लोगों ने दी। हर्षवर्धन श्रृंगला ने 26 नवंबर को पीएम ओली के साथ 50 मिनट की एक-एक बातचीत की, जिसमें दोनों देशों को लिपु लेख सीमा रेखा की वजह से दोनों देशों में बिगड़े रिश्ते को सामान्य करने पर फोकस किया।

यहां बताना जरूरी है कि ट्रेवल एयर बबल के तहत हवाई यात्रा के लिए दो देशों के बीच करार किया जाता है। दो देशों द्वारा द्विपक्षीय समझौता कर के जब एक खास एयर कॉरिडोर बनाया जाता है तो उसे एयर बबल कहते हैं, ताकि हवाई यात्रा में कोई दिक्कत ना आए। इसके तहत दो देशों के वैलिड वीजा वाले पैसेंजर एक-दूसरे के देश में बिना परेशानी के जा सकते हैं। इसमें मुख्य तौर पर सरकारी एयरलाइंस से सफर करने वाले पैसेंजर होते हैं। कोरोना को लेकर भारत और नेपाल के बीच में भी यह ट्रेवल एयर बबल्स बंद है और उम्मीद की जा रही है कि इस पर जल्द ही नेपाल और भारत के बीच सकारात्मक बातचीत हो सकती है।

उन्होंने कहा, ‘वे रिश्ते को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं और इस संबंध में कुछ सकारात्मक संकेत भेजेंगे। हालांकि, वे चाहते हैं कि सीमा विवाद पर भी चर्चा हो। द्विपक्षीय सहयोग को गहरा करने के पहले कदम के रूप में दोनों देश ठंडे बस्ते में पड़े बहुउद्देशीय पंचेश्वर परियोजना पर बातचीत को फिर से शुरू कर सकते हैं और सीमा पर आवाजाही को सामान्य कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली दिसंबर में भारत दौरे पर होंगे, जिसके लिए तारीखों पर काम किया जा रहा है।

गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते में तब तनाव आ गया था, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई में उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे और धारचूला को जोड़ने वाले 80 किलोमीटर लंबे मार्ग का उद्घाटन किया था और कुछ ही दिनों बाद नेपाल ने एक नया मानचित्र जारी कर लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को अपनी सीमा के अंदर दिखाया। भारत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी और उसे ‘एक तरफा कृत्य करार दिया। उसने नेपाल को चेताया था कि क्षेत्रीय दावों का कृत्रिम विस्तार उसे स्वीकार नहीं है।

हालांकि, पिछले कुछ महीनों से दोनों देश अपने संबंधों में आए खटास को कम करने के लिए कुछ कदम उठा रहे हैं। भारत नहीं चाहता कि नेपाल पूरी तरह से चीन के पाले में चला जाए ताकि उसे भारत के खिलाफ नेपाल में अतिरिक्त लाभ उठाने का मौका मिल जाए। बता दें कि सीमा पर जारी गतिरोध के बीच चीन नेपाल को अपने पाले में करने की काफी समय से कोशिश करता रहा है।

मगर नई दिल्ली और काठमांडू के राजनयिकों का सुझाव है कि ऐसी कुछ चिंताएं हैं कि चीन, जो नेपाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता दिख रहा है, काठमांडू को वापस अपनी पकड़ में ले सकता है। दरअसल, नेपाल में जारी राजनीतिक संकट और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के दो सह-अध्यक्षों केपी शर्मा ओली और पीके दहल उर्फ प्रचंड के बीच लड़ाई ने सत्तारूढ़ पार्टी को अनिश्चितता की ओर बढ़ा दिया और इसी ने चीन को हस्तक्षेप करने का मौका दे दिया।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार राजन भट्टाराय ने बताया था कि बीते दिनों दोनों देशों के बीच पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना और नई आर्थिक पहलों की शुरुआत समेत अहम परियोजनाओं को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों पर बातचीत की गई।

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