अविश्वास प्रस्ताव: सरकार या विपक्ष, किसे मिलेगा इसका सबसे ज्यादा फायदा?

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मोदी सरकार के पहले अविश्वास प्रस्ताव से किसको लाभ होगा? क्या सरकार इसके बाद और मजबूत होगी या विपक्ष के लिए यह फिर से संगठित होने का बड़ा मौका है? आम चुनाव से ठीक दस महीने पहले पेश अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार को बहस होने से ठीक पहले संसद से सड़क तक, हर तरफ इसी बात को लेकर चर्चा और उत्सुकता है।

मोदी के लिए विपक्ष ने दी फ्री हिट?
शुक्रवार को संसद में अविश्वास प्रस्ताव का अंत पीएम नरेन्द्र मोदी करेंगे। विपक्ष भी पीएम मोदी की संवाद करने की क्षमता और अजेंडा सेट करने की ताकत को मानता है। वहीं बीजेपी को लगता है कि विपक्ष ने पीएम मोदी को फ्री हिट दे दी है, जहां से वह एक बार राजनीति का न सिर्फ अजेंडा सेट कर देंगे बल्कि उनकी कमियों को उजागर कर देंगे। पीएम मोदी इसके अगले ही दिन यूपी में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। जाहिर है कि वह इस प्लैटफॉर्म पर मोदी बनाम सभी का अजेंडा सेट करने की पूरी कोशिश करेंगे।

फिर विपक्ष ने यह रास्ता क्यों चुना?
न नंबर है और न ही दमदार स्पीकर है। सदन में लंबी बहस, यह जानते हुए कि इसका परिणाम सरकार के पक्ष में ही जाना है, फिर भी विपक्ष ने क्यों यह रास्ता चुना? एनबीटी ने जब विपक्ष के कुछ सीनियर नेताओं से यह सवाल पूछा तो यह आम राय सामने आई कि वे लड़ता हुआ दिखना चाहते हैं। आम चुनाव से ठीक 10 महीने पहले वे यह दिखाना चाहते हैं कि वे लड़ने के लिए अब मानसिक रूप से तैयार हैं?

कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने कहा कि अब रक्षात्मक राजनीति का टाइम नहीं है। विपक्ष को लगता है कि दिन भर चलने वाली बहस में अब लेग उनके पॉइंट भी सुनेंगे और यह उनके लिए एक बेहतर मौका होगा। विपक्ष का दावा है कि शुक्रवार को लोग दोनों पक्षों की बात सुनेंगे और उनके लिए यह शानदार मौका है अपनी बात रखने का, भले ही इसका नतीजा कुछ भी क्यों न हो। यही कारण है कि कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी कमान संभालेंगे। पार्टी की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया और मल्लिकाजुर्न खड़गे भी बोलेंगे।

टीडीपी का प्रस्ताव सामने लाकर मास्टर स्ट्रोक मारा सरकार ने?
बुधवार को मॉनसून सत्र के पहले ही दिन जब सरकार ने टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार कर शुक्रवार को ही इस पर बहस करने का एलान किया तो विपक्ष भी चकित रह गया। पिछले सत्र में इस बहस से लगातार भागते दिखने वाली सरकार से इसकी उम्मीद नहीं थी, लेकिन बाद के घटनाक्रम से अब ऐसा लग रहा है कि सरकार पूरी योजना के साथ पहले से तैयार थी। ऐसे में टीडीपी का प्रस्ताव स्वीकार करना अब सरकार की रणनीति ही लग रही है। जब से प्रस्ताव स्वीकार हुआ है तब से सरकार दावा कर रही थी कि वह इसमें जितने वोट लेगी, उससे विपक्ष चकित रह जाएगा। अब सरकार की पूरी कोशिश इस दावे को अमल में लाने की है।

अंतिम ओवर में कुछ सरप्राइज होगा क्या?
सरकार के पक्ष में कौन रहेंगे और सरकार के खिलाफ कौन जाएंगे, इसमें कुछ दलों ने गुरुवार को अपने स्टैंड साफ कर दिया। हालांकि सरकार की सहयोगी शिवसेना शुक्रवार को ही अपने पत्ते खोलेगी। यूपीए, टीडीपी के अलावा एसपी और टीएमसी दलों ने अपना रुख साफ कर लिया है, लेकिन जिन राजनीतिक दलों पर सबसे अधिक नजर रहेगी वे दल हैं- एआईएडीएमके, बीजेडी और टीआरएस। सूत्रों के अनुसार, इनमें एआईएडीएमके और टीआरएस तो कम से कम टीडीपी के समर्थन वाले प्रस्ताव के साथ नहीं जाएंगी। लेकिन सरकार को सपोर्ट करेंगी या वोटिंग में अनुपस्थित रहकर न्यूट्रल स्टैंड लेगी, इस बारे में अभी संदेह है।

दोनों दलों के पास सरकार को सपोर्ट करने के पीछे तर्क टीडीपी का प्रस्ताव होना है। तेलंगाना का आंध्र प्रदेश से अपना विवाद है तो एआईडीएमके का तर्क है कि कावेरी नदी के मुद्दे के दौरान टीडीपी ने सपोर्ट नहीं किया था। बीजेडी सूत्रों ने भी बताया कि वह सदन के अंदर सरकार पर हमला कर न्यूट्रल स्टैंड ले सकती है। अगर तीनों दल किसी का भी साथ नहीं देते हैं तो सरकार और विपक्ष का अधिक से अधिक सहयोगी जुटाने की लड़ाई ड्रॉ में तब्दील हो सकती है। एसपी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा स्थिति में सरकार का समर्थन करने का कोई आधार नहीं है और सदन में विपक्ष के साथ रहेगी।

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