चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के पत्र पर रणदीप सुरजेवाला ने कहा ‘चुनाव आयोग मोदी जी का पिट्ठू बन चुका है ।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोरा ने कहा 'इस समय ऐसा विवाद खड़ा करने की कोई ज़रुरत नहीं थी। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि तीनों मेम्बरों के मत हर समय एक जैसे हों

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चुनाव आयुक्त अशोक लवासा (Ashok Lavasa) ने चुनाव आयोग की मीटिंग में शामिल होने से साफ मना कर दिया है. लवासा ने यह फैसला अल्पमत के फैसले को रिकॉर्ड नहीं किए जाने के विरोध में लिया. लवासा ने कहा, ‘मीटिंग में जाने का कोई मतलब नहीं है इसलिए दूसरे उपायों पर विचार कर सकता हूं.’

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने दावा किया था कि पीएम मोदी को विवादित बयानों के मामले में क्लीन चिट दिये जाने पर उनके (लवासा) फैसले को रिकॉर्ड नहीं किया गया. गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने पीएम मोदी को 6 मामलों में किसी भी पोल कोड के उल्लंघन का दोषी नहीं माना था. चुनाव आयोग (Election Commission) की तीन सदस्यीय कमीशन में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और दो चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और सुशील चंद्रा शामिल थे.

अशोक लवासा ने 4 मई को लिखे अपने पत्र में दावा किया था, ‘जब से अल्पमत को रिकॉर्ड नहीं किया गया तब से लेकर मुझे कमीशन की मीटिंग से दूर रहने के लिए दबाव बनाया गया.’ लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा था और कहा था, ‘जब से मेरे अल्पमत को रिकॉर्ड नहीं किया गया तब से कमीशन में हुए विचार-विमर्श में मेरी भागीदारी का अब कोई मतलब नहीं है.’

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने लिखा, ‘इस मामले में दूसरे कानूनी तरीकों पर भी विचार करेंगे. मेरे कई नोट्स में रिकॉर्डिंग की पारदर्शिता की जरूरत के लिए कहा गया है.’ इस पत्र को पाने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने अशोक लवासा के साथ मीटिंग बुलाई थी. बता दें कि चुनाव आयोग ने पीएम मोदी द्वारा गुजरात में 21 मई को दिए गए भाषण के मामले में क्लीन चिट दे दी थी. इस फैसले पर लवासा ने असहमति जताई थी.

अशोक लवासा के पत्र पर रणदीप सुरजेवाला (Randeep Singh Surjewala) ने कहा ‘चुनाव आयोग मोदी जी का पिट्ठू बन चुका है । अशोक लवासा जी की चिट्ठी से ये साफ़ है कि CEC और उनके सहयोगी लवासा जी का जो भिन्न ओपिनियन है मोदी जी और अमित शाह को लेकर उसको भी रिकॉर्ड करने को तैयार नहीं हैं।

अशोक लवासा के पत्र के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोरा (Sunil Arora ने पत्र जारी किया और लिखा ‘इस समय ऐसा विवाद खड़ा करने की कोई ज़रुरत नहीं थी। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि तीनों मेम्बरों के मत हर समय एक जैसे हों, कई बार मतभेद हो ही जाता है। किसी भी मतभेद होना अच्छा होता है और होना भी चाहिए। लेकिन हर बार मुद्दों का निवारण चुनाव आयोग की चार दीवारीमें ही हुआ है कभी मीडिया में नहीं गया। चुनाव के 6 चरण ख़तम हो चुके हैं। छोटी मोटी घटनाओं के बावजूद अभी तक सब कुछ ठीक से हो गया है। अब जब सब आखिरी चरण की तैयारी में लगे हैं और इसके बाद 19 मई को मतगणना भी होनी है इस विवाद की कोई ज़रुरत नहीं थी। हर चीज़ का अपना समय होता है।

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